लिंग की अभिलाषा
चाह नहीं मैं एकांत में ,
कही पर भी मुठियाया जाऊं,
चाह नहीं मै सिर्फ मूतने
के काम ही आऊं,
चाह नहीं, सुन्दरियों के विचार मात्र से ,
हे बंधू , सिर्फ अकड़ता जाऊं
चाह नहीं, किसी के मुख में
घुसु भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे कच्छे से बाहर निकालना , ऐ मालिक,
उस कुवांरी योनी के अन्दर देना तुम फेंक,
घुसने को जिसके अन्दर
व्याकुल हो लिंग अनेक।👈👈






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