Friday, 26 July 2013

लिंग की अभिलाषा ling ki kahani

 लिंग की अभिलाषा 


चाह नहीं मैं एकांत में ,
कही पर भी मुठियाया जाऊं,

चाह नहीं मै सिर्फ मूतने 
के काम ही आऊं,

चाह नहीं, सुन्दरियों के विचार मात्र से ,
हे बंधू , सिर्फ अकड़ता जाऊं 

चाह नहीं, किसी के मुख में 
घुसु भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे कच्छे से बाहर निकालना , ऐ मालिक,
उस कुवांरी योनी के अन्दर देना तुम फेंक,

घुसने को जिसके अन्दर 
व्याकुल हो लिंग अनेक।👈👈

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